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काबुलीवाला के देश की सैर कराती राकेश तिवारी की पुस्तक ‘अफगानिस्तान से खत-ओ-किताबत’

Hindi Books: राजकमल प्रकाशन से छपकर आई लेखक राकेश तिवारी (Rakesh Tiwari) की पुस्तक ‘अफगानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत’ पत्र शैली में लिखा गया दिलचस्प यात्रा-वृत्तांत है जो 1977 के अफगानिस्तान और ईरान के समाज, वहां की संस्कृति और समृद्धि के बारे में हमें सलीके से पर्याप्त जानकारी देती है. आज जिस तरह के अफ़ग़ानिस्तान को हम ख़बरों में देख रहे हैं, वह इस किताब के अफ़ग़ानिस्तान से उलट है.

आखिर पांच दशकों के भीतर-भीतर ऐसा क्या हो गया कि आधुनिक हो रहे एक समाज पर दकियानूस नजरिया हावी होता चला गया. इस किताब को पढ़ना एक देश के इतिहास को समझने जैसा है. राकेश तिवारी के यात्रा-वृत्तांत एक पुरातत्ववेत्ता (archaeologist) की निगाह से हमें किसी जगह को दिखाते हैं. उनकी भाषा की रवानगी का अपना आकर्षण होता है. ऐसे में ‘अफगानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत’ को पढ़ना कई तरह के अनुभवों की यात्रा जैसा है.

प्रस्तुत है ‘अफगानिस्तान से खत-ओ-किताबत’ (Afghanistan se Khat o Kitab) पुस्तक का एक अंश-

अफ़साना-ए-रुख़साना
शहर से एक किलोमीटर उत्तर में एक फर्लांग के कच्चे रास्ते से होकर पहुंच गए ‘सिकन्दर नगरी’ कही जा रही पुरानी बसावट की मिट्टी की ऊंची दीवारों के घेरे में. एक किनारे से आती सवारियों से लदी लारियां, पैदल सैलानियों का भी रेला. भीतर पहुंचकर ख़ालिस पुराविद की तरह कुछ देर इधर-उधर तजवीज़ने की कोशिश के बाद भी इधर-उधर बिखरे रंगीन प्लास्टर के टुकड़ों और क़िले के ढूहों और मलबे के आपसी रिश्ते का जोड़ नहीं बिठा पाया.

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पश्चिमी किनारे पर लहराते लाल, हरे, नीले, स्याह और सफ़ेद परचमों के पास एक कुआं, कई मज़ारें, पुरानी ईंटों के कुछ मक़ानात और कुछ चितकबरे क़बूतर. कुछ लोग वहीं ज़मीन पर रखा एक भारी पत्थर बाईं ओर से उठाकर कंधे पर रखते फिर दाईं ओर से उतारकर ज़मीन पर धर देते. इस दरमियान वहां मौजूद मौलाना हरे कपडे़ में बंधा धातु का झुनझुना उस पर ऊपर-नीचे फेरते हुए मुंह ही मुंह में बुदबुदाते जाते. जैसे अपने यहां के मेलों में ओझा और फ़क़ीर लोगों पर चढ़े भूत-जिन्नात उतारते दिखते हैं.

दरवाज़े पर सजी दुकानों में आसार-ए-क़दीमा वाले पुराने सामान ख़रीदे और बेचे जाते दिखे— रंगीन पत्थरों के मनकों वाली माला, पत्थर के बुत, कटार-शमशीर, तोड़ेदार बन्दूकें, सिक्के और लाज़वर्द के ढोंके. मनमाने का सौदा, जैसे गाहक वैसे दाम. वही चीज़ कोई हज़ार अफ़ग़ानी में ख़रीदता और कोई उसी को पचास अफ़ग़ानी में हथिया लेता. कैसे भी सिक्के क्यों न हों सिकन्दर के वक़्त के ही बताए जाते. और कटारें-शमशीरें ऐन जंगी ख़ून से सनी, तैमूरी या अंग्रेज़ी.

हद तो तब हो गई जब एक दुकानदार ने पत्थर पर बने तीर दिखाते हुए पूरे भरोसे से बताया कि इन्हें सिकन्दर के फ़ौजी इस्तेमाल करते थे और उन्हें क़िले के भीतर पड़े मिले हैं. लेकिन अब तक पाई आर्किओलॉजी की तालीम की बदौलत मुझे यह पहचानते देर नहीं लगी कि ये उपकरण सिकन्दर से बहुत पहले की ‘स्टोन एज कल्चर’ से ताल्लुक रखते हैं और आसपास के इलाक़े से बटोरकर लाए गए होंगे. पुराने ज़माने के बार्टर सिस्टम की तरह ‘अफ़ग़ान टूरिस्ट डिपार्टमेंट’ से मिले एक रंगीन फोल्डर के बदले उनमें से दो नमूने लेकर मैंने गुरुजी को दिखाने की नीयत से गठिया लिए.

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बल्ख़ से सटाकर यह शहर बसाने से पहले, पूर्वी यूरोप के मकदूनिया से चली सिकन्दर की फ़ौजी मुहिम ने चार ही बरस में दो सौ बरस पुरानी हख़मनी हुकूमत को तो पूरी तरह से फ़तह कर लिया, मगर ख़ुद सिकन्दर शिकस्त खाकर गिरफ़्त में जा फंसा—‘आमू दरिया’ के उस पार के मूल बाशिन्दे, बैक्ट्रिया के एक अमीर की तेरह साल की तरुणी बेटी रुख़साना के रुख़-ए-नूर में. और फिर, जरनैलों और साथियों के लाख समझाने के बाद भी उसका हाथ थामकर ही माना.

कितनी ख़ूबसूरत होती हैं यहां की तरुणाएं, यह हम आज तो भर आंख आंक नहीं सकते, लेकिन इतना ही काफ़ी है यह जानने के लिए कि उनके सामने दुनिया फ़तह करने वाला सिकन्दर तक सुध-बुध खो बैठा था. भला हो इस हिजाब का, इन्हें देखकर कहीं मैं भी यहीं फंस जाता तो फिर तेरा क्या होता!

सिकन्दर ने रुख़साना के बाप को हिन्दूकुश के आसपास के इलाक़े का छत्रप बनाया, उसके भाई को अपने ख़ास घुड़सवार दस्ते में शामिल किया और रुख़साना को दूर, फ़ारस के सूसा नाम के शहर में महफ़ूज़ जगह पर भेज दिया. उसके बाद वह हिन्द की मुहिम पर निकला. इधर फ़ारस में रुख़साना ने सिकन्दर के बेटे को जन्म दिया. उधर सिकन्दर हिन्द की जंग में मशगूल रहा. वहीं एक जगह लड़ते हुए घायल हुआ और वहां से लौटने के बाद, आज से क़रीब तेईस सौ साल पहले (323 ईसा पूर्व) जब बेबीलोन शहर में उसका इंतक़ाल हुआ, रुख़साना की उम्र बस सत्रह बरस की ही थी. इस तरह सिकन्दर और उसके साथ की कहानी बस चार बरस ही चल पाई.

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कहा जाता है कि सिकन्दर के इंतक़ाल के बाद रुख़साना ने अपने बेटे ‘अलेक्सान्दर (सिकन्दर) चतुर्थ’ की ताजपोशी का रास्ता साफ़ करने के लिए अपनी सौत स्टतेरीआ (द्वितीय) और उसकी बहन और कज़िन (सिकन्दर की तीसरी रानी) का क़त्ल कर दिया. फिर, सिकन्दर की मां ओलिम्पिअस ने रुख़साना और उसके बेटे को मक़दूनिआ में हिफ़ाज़त से रखा. लेकिन सात साल बीतते-बीतते हुकूमत की कूटनीतियों के चलते ‘ओलिम्पिअस’ का भी क़त्ल करके रुख़साना और उसके बेटे को क़ैद कर लिया गया. लेकिन सिकन्दर का असली वारिस कहीं उसके तख़्त का दावेदार बनकर खड़ा न हो जाए इसलिए छह साल बाद ज़हर खिलाकर मां-बेटे की कहानी भी ख़त्म कर दी गई.

रुख़साना की कुल तीस बरस की रूमानी ज़िन्दगी के मशहूर अफ़साने, उसी ज़माने से तमाम ज़ुबानों और मुल्कों की बेशुमार कहानियों, उपन्यासों, चित्रों और फिर, फिल्मी मज़मूनों में जिए जा रहे हैं. अलग-अलग भाषा-बोलियों में रुख़साना के रोक्साना, राओकशना, रोक्सान्ने, रोक्सान्ना, रोक्सान्द्रा और रोक्साने जैसे नाम भी मिलते हैं. एकबारगी यह नाम सुनकर लगा कहीं इसका कोई रिश्ता ‘रेक्सोना सोप’ के नामकरण से तो नहीं, ऐसा साबुन—जिसे लगाओ और रुख़साना जैसा मोहक रूप पाओ.

पुस्तक के बारे में (ABout Afghanistan se Khat o Kitab Book)
अफगानिस्तान की जो तस्वीरें इधर दशकों से हमारे ज़ेहन में आ-आ कर जमा होती रही हैं, ख़ून, बारूद, खंडहरों और अभी हाल में जहाज़ों पर लटक-लटक कर गिरते लोगों की उन तमाम तस्वीरों का मुक़ाबला अकेला काबुलीवाला करता रहा है, जो हमारी स्मृति की तहों में आज भी अपने ऊंचे कंधों पर मेवों का थैला लटकाए टहलता रहता है.

यह किताब उसी काबुलीवाले के देश की यात्रा है जिसे लेखक ने 1977 के दौरान अंजाम दिया था. तेईस साल की उम्र में बहुत कम संसाधनों और गहरे लगाव के साथ लेखक ने पैदल और बसों में घूम-घाम कर जो यादें इकट्ठा की थीं, इस किताब में उन्हें, तमाम ऐतिहासिक-भौगोलिक जानकारियों, तथ्यों के साथ संजो दिया है.

आज की पृष्ठभूमि में इसे पढ़ना एक अलग तरह का सुकून देता है, और इसे पढ़ना यह जानने के लिए ज़रूरी है कि बीती चार दहाइयों ने दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत जगहों में एक, अनेक धर्मों की भूमि रहे उस देश से क्या-क्या छीन लिया है.

विश्व की बड़ी सैन्य ताक़तों के ख़ूनी खेल का मोहरा बनने से पहले का यह अफ़ग़ानिस्तान-वर्णन बर्फ़ीली घाटियों, पहाड़ों के बीच मोटे गुदगुदे गर्म कपड़ों में गुनगुनी चाय का प्याला हाथों में दबाए, राजकपूर की फ़िल्मों के गाने सुनने का-सा अहसास जगाता है.

राकेश तिवारी (About Author Rakesh Tiwari)
राकेश तिवारी, रॉकी का जन्म 2 अक्टूबर, 1953 को सीतापुर ज़िले के बिसवां गांव में हुआ. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विषय में स्नातकोत्तर, मिर्ज़ापुर के चित्रित शैलाश्रयों पर अवध विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की. लगभग चार दशक तक देश के विभिन्न भागों में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण एवं उत्खनन तथा गंगा-घाटी को दक्षिण भारत से जोड़नेवाले प्राचीन ‘दक्षिणा-पथ’ की यात्रा एवं गहन अध्ययन. किया और कई देशों की यात्राएं कीं.

राकेश तिवारी यात्रा संस्मरण लिखते हैं. उनकी लखनऊ से काठमांडू तक साइकिल से नेपाल की यात्रा पर आधारित ‘पहियों के इर्द-गिर्द’, दिल्ली से कलकत्ता तक की नौका-यात्रा पर आधारित यात्रा-वृत्तान्त ‘सफ़र एक डोंगी में डगमग’, उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भू-भाग (ज़िला–मिर्ज़ापुर, सोनभद्र और चंदौली) के सर्वेक्षण एवं सैर पर आधारित संस्मरण ‘पवन ऐसा डोलै’, चिली एवं टर्की की यात्राओं पर आधारित यात्रा विवरण ‘पहलू में आए ओर-छोर : दो देश : चिली और टर्की’ काफी चर्चित रही हैं.

पुस्तक- अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत
लेखक- राकेश तिवारी
प्रकाशक- सार्थक (राजकमल प्रकाशन उप्रकम)
मूल्य- 250 रुपये

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