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दास्तान-गो : सितारा देवी यानी ‘औरत की शक़्ल में तूफ़ान’, ऐसा स’आदत हसन मंटो कहा करते थे!

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, बात उन दिनों की है, जब उर्दू अदब के मशहूर नग़मा-निग़ार स’आदत हसन मंटो बंबई में ही रहते थे. उन दिनों फिल्मी दुनिया में मंटो साहब के एक अज़ीज़ दोस्त होते थे. वही, जिन्होंने मुग़ल-ए-आज़म बनाई थी. करीमुद्दीन आसिफ़ साहब. जिन्हें लोग के. आसिफ़ के नाम से जानते हैं. तो आसिफ़ साहब, तब अपने सगे जीजा और मशहूर फिल्मकार नज़ीर अहमद खान की ‘दूसरी बीवी’ पर ख़ूब लट्‌टू हो चुके थे. आसिफ़ तब बंबई में नए-नए आए थे और जीजा के ही ज़रिए फिल्मी दुनिया में पैर जमाने की क़ोशिश कर रहे थे. पर तभी उन्हें इश्क़ हो गया. इस चक्कर में जीजा से अनबन तो हुई ही उनकी. क्योंकि जीजा को इस कारण अपनी दूसरी बीवी को तलाक़ कहना पड़ा. इसके साथ ही, आसिफ़ साहब को फिर उन मोहतरमा से शादी भी करनी पड़ी. यह बात होगी शायद 1945-46 के आस-पास की. क्योंकि तब दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म हुआ था.

उस वक़्त तक आसिफ़ साहब की यह दूसरी शादी थी. पहली ख़ानदानी रस्म-ओ-रिवाज़ से हुई थी. जबकि उन मोहतरमा की शायद तीसरी थी. क्योंकि नज़ीर साहब से पहले उनकी काफ़ी कम उम्र में भी एक शादी हुई थी, जो ज़्यादा चली नहीं, ऐसा बताया जाता है. नज़ीर साहब के साथ भी नहीं ही चली. हालांकि आसिफ़ साहब के साथ उनका रिश्ता कुछ ज़्यादा चल गया. तब उसी दौरान उन दोनों से वाक़िफ़िय्यत रखने वाले मंटो साहब ने आसिफ़ साहब से एक बार कहा था, ‘आसिफ़! मैं सालों से कई औरतों को जानता हूं. मैंने कइयों को नज़दीकी नज़र से देखा है. लेकिन मुझे तुम्हारी ‘इन बेगम’ के बारे में जितना पता चलता है, मैं उन्हें जितना अधिक समझने की कोशिश करता हूं, उससे मैं कह सकता हूं कि यह औरत नहीं, बल्कि एक तूफ़ान हैं’. और जनाब, यह कोई पहला मौक़ा नहीं था जब मंटो जैसी किसी शख़्सियत ने इन मोहतरमा को यूं समझा था.

इससे भी पहले बंबई की मलाबार हिल्स में एक वाक़ि’आ घटा. साल 1936-37 के आस-पास. अंग्रेज तब हिन्दुस्तान को बांटने की कोशिश में लगे थे और तमाम हिन्दुस्तानी शख़्सियतें इस कोशिश में थीं कि अंग्रेजों की मंसूबों पर पानी फेर दिया जाए, कैसे भी. इस सिलसिले में बंबई में मलाबार हिल्स पर एक बड़ी बैठक हुई थी. एक असरदार समाज़ी शख़्सियत आतिया बेग़म के घर पर. इस बैठक में गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) थे. ‘स्वर कोकिला’ सरोजिनी नायडू थीं. साथ ही, करीब 25-30 रियासतों के राजे-महाराजे थे. उस बैठक के दौरान तब उन्हीं मोहतरमा को वहां अपना डांस पेश करने के लिए बुलाया गया, जिन पर आसिफ़ साहब का दिल आ गया था. उन्हें आतिया बेग़म अक़्सर ऐसे मौकों पर बुलाया करती थीं. तो वहां उन्होंने अपना डांस किया, जिसका ‘गुरुदेव’ पर ऐसा असर पड़ा कि उन्होंने वहीं उन्हें ‘कथक साम्राज्ञी’ का ख़िताब दे डाला था.

लेकिन जनाब, इस मलाबार हिल्स वाले वाक़ि’अे से भी पांच-छह साल पीछे चलिए. ‘कथक साम्राज्ञी’ के तौर पर नवाज़ दी गईं इन्हीं मोहतरमा की उम्र उस वक़्त 10-11 बरस की समझिए. मतलब साल होगा 1930 के आस-पास कोई. क्योंकि इन मोहतरमा की पैदाइश आठ नवंबर 1920 की बताई जाती है. इनका मिश्रा बरहमन ख़ानदान बनारस से त’अल्लुक रखता था. मगर पिता जी पंडित सुखदेव मिश्र किसी कारण परिवार समेत बंगाल चले गए थे. वहीं कलकत्ते में इन मोहतरमा की पैदाइश हुई. बचपने में इन्हें नाम दिया गया था धनलक्ष्मी क्योंकि दीवाली से पहले धनतेरस के दिन ये पैदा हुई थीं. पिता जी संस्कृत भाषा के साथ संगीत, नृत्य के भी बड़े जानकार थे. उनकी तीन बेटियां हुईं. अलकनंदा, तारा और धनलक्ष्मी. तीनों को उन्होंने ही गीत, संगीत और कथक नृत्य की ता’लीम दी. समाज़ के उन्हें उलाहने दिए. बातें की. पर उन्होंने किसी की परवाह न की.

बताते हैं, उसी दौरान एक बार 10-11 बरस की धनलक्ष्मी ने एक कार्यक्रम अपने नृत्य का प्रदर्शन किया था. तब उस दौर के कुछ अख़बारों ने उस कार्यक्रम के बाद लिखा था, ‘एक बालिका धन्नो ने नृत्य प्रदर्शन से दर्शकों को चमत्कृत कर दिया’. कहते हैं, इस खबर को पढ़ते ही पंडित सुखदेव जी को धन्नो के मुस्तक़बिल (भविष्य) का अंदाज़ा हो गया था. वे समझ गए कि उनकी बेटी गीत, संगीत, नृत्य की दुनिया के आसमान में किसी सितारे की तरह चमकने वाली है. लिहाज़ा, उन्होंने उसी रोज से अपनी ‘धन्नो’ का नाम सितारा देवी रख दिया. सितारा देवी, यानी गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने जिन्हें ‘कथक साम्राज्ञी’ कहा वो. सितारा देवी, यानी आसिफ़ साहब जिन्हें देखते ही दिल हार बैठे वो. सितारा देवी, यानी जिन्हें मंटो साहब ने ‘औरत की शक़्ल में तूफ़ान’ क़रार दिया वो. वैसे, ‘इस तूफ़ान’ का सामना करने वाले आसिफ़ या मंटो साहब कोई इक़लौते या पहले नहीं थे.

बताते हैं, जब ये महज़ आठ बरस की थीं. यानी 1928 के आस-पास. तभी समाज़ी रवायतों के मुताबिक, इनकी शादी कर दी गई. इसके बाद उनके ससुराल वालों ने मंशा जताई कि ये घर-बार संभालें. जैसे आम लड़कियां संभालती हैं. लेकिन ये कोई ‘आम लड़की’ होतीं तब न! इन्होंने ज़िद पकड़ ली कि स्कूल जाना है. पढ़ाई करनी है. ससुराल वालों को यह बात नाग़वार गुज़री. उनकी आन पर बन आई. भला, भले ख़ानदान की लड़कियां भी घर की देहरी से बाहर क़दम धरती हैं क्या? लोग क्या कहेंगे? ऐसी बातें हुईं. समझाने की कोशिशें भी. लेकिन ये नहीं मानीं. आख़िर ससुरालवालों ने नाता तोड़ लिया. पिता जी ने बेटी का साथ दिया. उसका दाख़िला कामछगढ के हाईस्कूल में करा दिया. वहीं, उन्होंने वह नृत्य प्रदर्शन किया, जिसके बारे में अख़बारों में लिखा गया था. और वहीं, उसी उम्र में, वे धन्नो से सितारा और सितारा से ‘कथक गुरु सितारा देवी’ हो गईं.

कहते हैं, पंडित सुखदेव जी को जल्द ही यह एहसास हो गया कि उन्हें अगर बेटियों को गीत, संगीत, नृत्य की दुनिया में आगे ले जाना है, उन्हें वहां लेकर जाना होगा, जहां इस फ़न के क़द्रदान रहा करते हैं. यानी कि आज की मुंबई और उस ज़माने की बंबई. सो, वे बंबई आ गए. तब शायद सितारा देवी 12-13 बरस की ही थीं. वहां पहुंचने का पंडित सुखदेव जी का फ़ैसला सही ही रहा. जल्द सितारा देवी को  फिल्मकार निरंजन शर्मा ने अपनी फ़िल्म ‘ऊषा हरण’ में अदाकारी का मौक़ा दे दिया. हालांकि यह फ़िल्म पूरी होने में सात साल लग गए, पर सितारा देवी के सितारे उससे काफ़ी पहले ही चमक उठे थे. अगले दो साल में वह ‘वसंत सेना’, ‘अनोखी मोहब्बत’, ‘शहर का जादू’, ’वीर का बदला’ जैसी कई फ़िल्मों में नृत्य और अदाकारी का जादू बिखरतीं दिखीं. फिर,  1940 के आस-पास वह नज़ीर अहमद ख़ान से जुड़ीं. इसके बाद आसिफ़ साहब के साथ.

और जनाब, आसिफ़ साहब ही थे जिन्हें शायद ‘सितारा देवी’ नाम के तूफ़ान की सबसे ज़्यादा मार भी पड़ी. इसकी वज़ह यूं बनीं कि आसिफ़ साहब कुछ दिलफ़ेंक क़िस्म की शख़्सियत हुआ करते थे. सितारा देवी के साथ शादी करने के बाद जब वे ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बना रहे थे, तो उनका दिल उस फ़िल्म की अदाकारा निग़ार पर आ गया. निग़ार को आसिफ़ साहब ने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में ‘बहार’ का किरदार दिया था. उन्होंने तब  सितारा देवी से कहा था, ‘निग़ार तुम्हारी दोस्त है, इसलिए उसे पिक्चर में ले रहा हूं’. सितारा देवी ने भी इसकी मंज़ूरी दे दी थी. लेकिन ज़ल्द ही उन्होंने पाया कि निग़ार की ज़्यादा दोस्ती अब आसिफ़ साहब से हो चुकी है. बल्कि कुछ वक़्त बाद तो आसिफ़ साहब ने निग़ार को अपनी बेग़म बनाकर सितारा देवी के सामने ला खड़ा किया. तमतमा गईं इससे सितारा देवी. आसिफ़ साहब को छोड़ दिया. हालांकि निग़ार से उनकी दोस्ती बनी रही.

निग़ार ही नहीं, आसिफ़ साहब की पहली पत्नी से हुए बच्चों पर भी भरपूर मोहब्बत लुटाती रहीं. लेकिन तभी आसिफ़ साहब ने ऐसी ग़लती कर दी कि सितारा देवी की मोहब्बत उनके लिए नफ़रत में बदल गई. दरअस्ल, सितारा देवी फिल्मी दुनिया की उन दो चुनिंदा शख़्सियतों में शुमार रहीं, जो दिलीप कुमार साहब को राखी बांधती थीं. इनमें पहली थीं लता मंगेशकर. तो आसिफ़ साहब ने जब दिलीप साहब की छोटी बहन अख़्तर को भगाकर उनसे शादी की तो इस वाक़ि‘अे से बहुत कुछ टूट गया. दिलीप साहब बुरी तरह टूट गए. आसिफ़ साहब के साथ उनकी दोस्ती टूट गई. सितारा देवी के साथ आसिफ़ साहब का रिश्ता पूरी तरह टूट गया. और सितारा देवी के सब्र का बांध भी. कहते हैं, तब सितारा देवी ने आसिफ़ साहब को बद-दु’आ दी थी, ‘मैं आज के बाद तेरी शक़्ल तक नहीं देखूंगी आसिफ़! और एक दिन तू अपने इस ग़ुनाह पर बुरी मौत मरेगा’.

और तो और जनाब, हिन्दुस्तान की सरकार को भी सितारा देवी नाम के ‘इस तूफ़ान’ का सामना करना पड़ा था एक बार. सरकार ने उनके योगदान को देखते हुए 1969 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड दिया. फिर 1973 में पद्मश्री और 1995 में कालीदास सम्मान. इसके बाद उन्हें ‘पद्म भूषण’ पुरस्कार देने की घोषणा की गई. लेकिन उन्होंने ये पुरस्कार लेने से साफ़ मना कर दिया. कहा, ‘यह सम्मान नहीं अपमान है मेरा. क्या सरकार को कथक में मेरे योगदान के बारे में पता है? मैं ‘भारत रत्न’ से कम कोई पुरस्कार नहीं लूंगी’. तो जनाब, ऐसी थीं ‘औरत की शक़्ल में तूफ़ान’ सितारा देवी. यह तूफ़ान 25 नवंबर 2014 को उनके इंतिक़ाल के बाद शांत हुआ था. इनकी शख़्सियत से जुड़े मुख़्तलिफ़ पहलू उनके ख़ुद के इंटरव्यूज़ वग़ैरा से हासिल किए गए हैं. दिलीप साहब की एक आत्मकथा है, ‘द सबस्टेंस एंड द शैडो’. उसमें सितारा देवी के हवाले से तमाम वाक़ि’अे ज़ाहिर किए गए हैं. उन्हीं सबको मिला-जुलाकर उनकी ये दास्तान लिख दी गई है.

आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.

Tags: Birth anniversary, News18 Hindi Originals

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