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बच्चों की परवरिश में पेरेंट्स से कहां हो रही है चूक? एक्सपर्ट से जानिए

Where are the parents going wrong : आजकल की लाइफस्टाइल में अकेलापन और जिंदगी में उदासी के कारण कुछ युवा ड्रग्स की राह पकड़ लेते हैं. ये देखने में आया है कि माता-पिता के साधन संपन्न और समझदार होने के बावजूद भी कुछ युवा ड्रग्स जैसी बुरी आदत के शिकार हो जाते हैं. और उसे अपनी कमजोरी बना लेते हैं. आखिर इसके पीछे की वजह क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं है हम (पेरेंट्स) बच्चों को जिंदगी का समीकरण तो सिखाते हैं, पर उन्हें जीवन का फलसफा (Philosophy) देना भूल जाते हैं? इस विषय पर हिंदुस्तान अखबार में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट (Clinical Psychologist) डॉ नीलिमा पांडेय (Dr. Neelima Pandey) लिखती हैं कि मैं अपने वर्क स्पेस में कई ऐसे लोगों को देखती हूं जो बहुत ही संपन्न परिवारों में पले बढ़े, लेकिन उन्होंने खुद समाज से जुड़ने का निर्णय लिया और आज वो ऐसी जगहों पर काम कर रहे हैं, जहां उन्हें टॉयलेट तक नसीब नही.

डॉ नीलिमा ने कुछ टिप्स सुझाए हैं, जिन पर हर पेरेंट को काम करने की जरूरत है. हमें ये सोचना होगा कि कहीं हमसे कोई चूक तो नहीं हो रही है?

युवा होते मन को समझें 
डॉ नीलिमा के अनुसार, युवा और किशोरों की कुछ मूलभूत मनोवैज्ञानिक जरूरतें होती हैं. जैसे अनजानी चीजों को समझना, आत्मविश्वास और स्वायत्तता (autonomy). इसी के साथ विरोधाभास ये होता है, कि उन्हें संगठित होना पसंद होता है. उन्हें दोस्त चाहिए, लोग चाहिए. यही युवा होते हैं, जो क्रांति लाते हैं, इसलिए नए पन और प्रयोगधर्मिता के लिए ही दुनिया युवाओं की तरफ देखती है.

मॉरल बिल्ड करना हो पहला स्टेप
पेरेंट्स के लिए जरूरी है अपने बच्चे का मनोबल (Morale) बढ़ाएं,  उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दें.  इसी के चलते वो अपनी लाइफ डिसाइड करता है. लाइफ में अच्छे-बुरे की समझ ही अंतर पैदा करती है और उसके मनोबल (Morale) का निर्माण करती है.  ये समझ बनती है पारिवारिक परिवेश से. उसने अगर बचपन से ही घर में होड़ देखी है तो उसके लिए भी भेड़चाल के प्रति सवाल करना बेकार बात होगी. वह पियर प्रेशर यानी साथियों के दवाब के विरोध में खड़ा नहीं हो पाएगा.
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क्रिटिकल एटिट्यूड भी जरूरी
अगर शिक्षा के दौरान भी बच्चा क्रिटिकल थिंकिंग से रूबरू नहीं हुआ है, तो समझो गए काम से. यहां मतलब सवाल करने से है, चीजों के मर्म को उनकी सार्थकता को समझने और विचारों के प्रति मुखरता से है. यह समझ ही भले और बुरे का निर्णय करने में बहुत मददगार होती है.

बच्चों को किसी से कम ना समझें
हमारे बच्चें चीजों को हमसे कहीं ज्यादा समझते हैं. इसलिए आप और आपके बच्चे में संवाद चलता रहना चाहिए. और अगर आप उस पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, तो प्रोफेशनल्स की मदद ले सकते हैं.

बार-बार डांटना पड़े तो
अगर आपको अपने बच्चे को बार बार डांटने की जरूरत पड़ती है, तो खुद पर फोकस कीजिए, शायद वो आपके नजरिए को समझ नहीं पा रहा है. ऐसे मामलों में प्रोफेशनल्स और लाइव कोचिंग प्रभावी होती है.

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ग्रुप पॉजिटिव एक्टिविटीज 
किशोर बच्चों को पॉजिटिव ग्रुप एक्टिविटीज में डालिए. उसे स्काउट्स, एनसीसी, स्पोर्ट्स जैसी एक्टिविटीज में डालिए. जहां उसे अपने आस्तित्व की सकारात्मक अभिव्यक्ति मिले.

छद्म व्यवहार से बचे
बच्चे छद्म (Pseudo) बहुत जल्दी समझते हैं. इसलिए हर वीकेंड पार्टी जाने या कुछ खर्चीला करने के पीछे आप जो कारण दें, वह सोच समझकर और सच्चाई से दें. इससे आपकी दिशा भी सही रहेगी.

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