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राबिया अल बसर: सूफ़ी संत के कुछ कलाम ‘सुनो तुम लिख के दे दो ना’

Sufi saint Rabia Basar: इस्लाम की मध्यकालीन सूफ़ी प्रेममार्गी परंपरा के बेहद चर्चित नामों में आपने बाबा फरीद, बुल्लेशाह और रूमी, शेख निजामुद्दीन औलिया, ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती जैसे नामों को खूब सुना होगा. आज हम बात करेंगे सूफ़ी संत राबिया अल बसर के बारे में. भक्ति और प्रेम की निर्गुण परंपरा में बहुत कम महिला संतों का नाम गूंजता है। राबिया अल बसर ऐसा ही सम्मानजनक एक नाम हैं. मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी जिन्हें हम केवल रूमी अधिक पुकारते हैं, से भी काफी पहले, यानी सूफी-इज़्म के इन्क्यूबेशन का दौर राबिया बसर से होकर गुजरता है. तप, दर्शन, प्रेम और खुदा की बंदगी के चलते वह लिखती हैं-
सूरदास की रचनाएं: अवगुण चित ना धरो, ​तुम मेरी राखो लाज हरि, अब की बेर उबारो
सुनो तुम लिख के दे दो ना
कहानी में कहाँ सच है
कहाँ पे रुक के तुम ने ग़ालिबन कुछ झूट लिखना है
कहाँ ऐसा कोई इक मोड़ आना है
जहाँ चालान मुमकिन है
कहाँ वो बेश-क़ीमत सा
सुनहरा छोटा सा डिब्बा जो अपनी धड़कनों से अपने होने की गवाही दे रहा है।

टूट जाना है
कहाँ क़ारी को समझाना है
दुख के इस अलाव में झुलसती सी कहानी रोक देना ही ज़रूरी है
सफ़र में रुक के सब को अलविदा’अ कहने का लम्हा लाज़मी है
कहाँ तारीख़ लिख के इस क़लम को जेब में रखना ज़रूरी हो गया है।

सुनो तुम ये बताओ ना
तुम्हारी तिलस्माती सी कहानी में कोई किरदार तो होगा
जो ज़िम्मेदार होगा
कहाँ पर मरकज़ी किरदार ने दुख दर्द सीने में छुपाना है
फ़लक को बद-गुमाँ कर के
ज़मीं को आसमाँ होता दिखाना है
नदामत और मलामत साथ रखनी है
हर इक साअ’त के सारे दुख उठाने हैं
निभाने हैं
बताना है
मोहब्बत ज़िंदगी का इस्तिआ’रा है
मोहब्बत रात का पहला सितारा है
या
दुख का आख़िरी कोई किनारा है.

राबिया अल बसर से जुड़ी साखियां उन्हें ऐसी संत के रूप में बताती हैं जिन्होंने खुद को परमात्मा के समक्ष पूरी तरह से समर्पित कर रखा था. इराक के शहर बसरा में 717 ईस्वी में जन्मी राबिया के बारे में लिखा गया है कि वह बेहद गरीब लेकिन नेक परिवार से ताल्लुक रखती थीं. उनके जन्म के समय घर में इतना तेल तक न था कि दिया जलाया जा सके! इतना कपड़ा भी न था कि बच्ची को लपेटा जा सके! बसरा के भयानक अकाल को झेलकर, माता-पिता और बहनों से बिछड़कर, गुलामी और तमाम तरह के उतार-चढ़ावों से गुजरीं राबिया का आध्यात्मिक सफर इश्क-ए-हकीकी की साक्षात मिसाल है. उन्होंने लिखा-

यहां सुनें इस्मत चुगताई की कहानी: ‘दो हाथ’

मोहब्बत राएगानी है सँभल जा
अज़िय्यत की कहानी है सँभल जा

तुझे मीरास में हिजरत मिली है
तभी तो ला-मकानी है सँभल जा

मोहब्बत जान को आई हुई है
बला-ए-ना-गहानी है सँभल जा

ये बर्क़ी राब्ते से कट न जाए
ये रिश्ता आसमानी है सँभल जा

इसे दरिया समझ कर पार मत कर
मिरी आँखों का पानी है सँभल जा

ये आँखें सुर्ख़ ये पैरों के छाले
किसी की मेहरबानी है सँभल जा

वो मेरे गाँव के रस्ते में होगा
अभी भी ख़ुश-गुमानी है सँभल जा।

बताते हैं कि हज़रत हसन बसरी को उन्होंने अपना मुर्शिद यानी गुरु धारण किया. 801 ईस्वी में चोला छोड़कर परमात्मा में विलीन हुईं राबिया की दरगाह येरुशलम के करीब है. बताते हैं कि वह आजीवन अविवाहित रहीं. गुलामी से आजाद होने के बाद अपना जीवन उन्होंने अल्लाह के नाम कर दिया था. जिस दौर की उनकी पैदाइश थी, उस दौरान जीवनयापन का यह तरीका निश्चित तौर पर अलहदा रहा होगा! लेकिन, राबिया के बारे में हमें जो जानकारी मिलती है, वह उन्हें मज़बूत महिला संत, कवि, भक्त और सबसे महत्वपूर्ण एक मुकम्मल इंसान के तौर पर पेश करती चलती है.

दोस्तो, इतिहास के पन्नों में, संतों और कवितों के ऐसे नगीने जमा हैं जिन्हें एक नज़र देखेंगे तो नज़र हटा ही नहीं पाएंगे.. फिलहाल राबिया को सलाम के साथ आपसे मैं लेती हूं विदा, अगली बार फिर मिलेंगे, एक नए पॉडकास्ट में। तब तक के लिए नमस्कार.

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