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स्वाद का सफ़रनामा: मसूर की दाल हाई कोलेस्ट्रॉल, एनीमिया करे दूर, हजारों सालों से है भोजन में शामिल ये दलहन

हाइलाइट्स

मसूर दाल के उत्पत्ति केंद्र अलग-अलग हैं.मसूर की दाल दो प्रकार की होती है, छिलका समेत और छिलका रहित.इस दाल को शरीर आसानी से पचा लेता है.

Masoor Dal Benefits and History: दालों की उत्पत्ति और खपत के मामले में भारत देश बहुत आगे है. उसका कारण यह है कि यहां की एक बड़ी आबादी शाकाहारी है. शरीर को पौष्टिक आहार प्राप्त करने के लिए उसे ऐसे आहार की ज़रूरत है, जिसमें बहुत कुछ हो. इस श्रेणी में भारतीय दालें मददगार हैं. इनमें मसूर की दाल भी श्रेष्ठ है. यह कोलेस्ट्रॉल को रोकती है और एनीमिया के खतरे को भी कम करती है. यह दालों में सबसे सस्ती मानी जाती है, लेकिन गुणों में किसी से कम नहीं है. हजारों साल पूर्व यह धरती पर उग आई थी. इसके उत्पत्ति केंद्र भी अलग-अलग हैं.

बहुत जल्द पक जाती है मसूर की दाल 

मसूर की दाल दो प्रकार की होती है. छिलका समेत है तो उसे काली मसूर कहा जाता है और छिलका उतार देने पर यह लाल मसूर या लाल दाल कहलाती है. इस दाल के साथ नापसंदगी जैसा कुछ मसला नहीं है यानी अमीर-गरीब, किसान-शहरी सभी को यह दाल पसंद आती है. इसकी कीमत अन्य दालों की अपेक्षा कम होती है और इसकी विशेषता है कि यह बहुत जल्द पक जाती है. नमक-मिर्च डालकर उबालो, एक ही भाप में पक जाएगी. ऊपर से तड़का मार दो. स्वाद बेहतरीन होगा और यह पौष्टिक भी कहलाएगी. इसे नॉनवेज के साथ पकाओ तो भी स्वाद उभरकर आता है. दाल-गोश्त में यही दाल इस्तेमाल की जाती है. कहते हैं कि गोश्त की गर्मी को यह कूल कर देती है और उसका स्वाद भी अलग बना देती है.

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मसूर दाल की कीमत अन्य दालों की अपेक्षा कम होती है और इसकी विशेषता है कि यह बहुत जल्द पक जाती है.

मसूर की दाल का है बेहद प्राचीन इतिहास 

कुछ रिसर्च रिपोर्ट और भोजन के इतिहास से जुड़ी पुस्तकों की बात करें तो मसूर दाल का इतिहास बेहद प्राचीन है. अमेरिक रिसर्च सेंटर शुष्क क्षेत्रों में कृषि अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र (ICARDA) के अनुसार, मसूर की दाल करीब 12,000 वर्ष पूर्व फर्टाइल क्रेसेंट रीजन (मध्य-पर्व क्षेत्र) में सबसे पहले पैदा हुई. यह विशाल क्षेत्र जिनमें आधुनिक इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, इजराइल, जॉर्डन, तुर्की और उत्तरी मिस्र आदि शामिल हैं. फिर 5000 और 4000 ईसा पूर्व के बीच मसूर की खेती पूर्व की ओर जॉर्जिया में चली गई और अंत में 2000 ईसा पूर्व के आसपास भारतीय क्षेत्र में पहुंच गई. अनुसंधान केंद्र के अनुसार, पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि भारतीयों ने शुरुआती हड़प्पा काल से मसूर आधारित व्यंजनों का आनंद लिया है, जो पहले शहरी केंद्रों की स्थापना के साथ लगभग 2800 ईसा पूर्व शुरू हुआ था. दक्षिण भारतीय लेखक केटी अच्चया ने अपनी पुस्तक ‘Everyday Indian Processed foods’ में जानकारी दी है कि मसूर दाल भारत में हजारों वर्षों से खाई जा रही है और इसे मांसाहार से भी अधिक पोषक माना जाता था.

मसूर की दाल करीब 12,000 वर्ष पूर्व फर्टाइल क्रेसेंट रीजन (मध्य-पर्व क्षेत्र) में सबसे पहले पैदा हुई.

आयुर्वेद के अनुसार पित्त और कफ में है लाभकारी

दूसरी और अमेरिकी-भारतीय वनस्पति विज्ञानी सुषमा नैथानी ने मसूर दाल के दो उत्पत्ति केंद्र माने हैं. पहला केंद्र उन्होंने भी फर्टाइल क्रेसेंट भू-भाग माना है और दूसरे केंद्र में सेंटर एशियाटिक सेंटर शामिल किया है, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान और उजबेकिस्तान शामिल है. विशेष बात यह है कि ईसा पूर्व सातवीं-आठवीं शती में लिए गए भारतीय आयुर्वेद ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ में इस दाल का वर्णन है. ग्रंथ में इसे ‘मसूर’ कहा गया है और जानकारी दी गई है कि यह दाल शीतल, मधुर और रूखापन पैदा करने वाली है. पित्त-कफ के दोष में इसका रस लाभकारी है. ग्रंथ यह भी कहता है कि मसूर की दाल को शरीर आसानी से पचा लेता है.

ईसा पूर्व सातवीं-आठवीं शती में लिए गए भारतीय आयुर्वेद ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ में इस दाल का वर्णन है.

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प्रोटीन, फाइबर और मिनरल्स से भरपूर है मसूर की दाल 

दूसरी ओर नवीनतम जानकारी के अनुसार, 100 ग्राम मसूर की दाल में 20 ग्राम कोर्बोहाइड्रेट, फाइबर 8 ग्राम, प्रोटीन 9 ग्राम के अलावा आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम के अलावा अन्य पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. जानी-मानी डायटिशियन अनिता लांबा के अनुसार, इस दाल में फाइबर और मिनरल्स की पर्याप्त मात्रा है, जो हृदय को फिट रखने के लिए ठीक मानी जाती है. यह फाइबर कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है. इस दाल में फोलेट (क्षतिग्रस्त लाल रक्त कोशिकाओं को दुरुस्त करने का रसायन) भी पाया जाता है. ऐसा होने से रेड सेल्स बढ़ते भी हैं, जिसके चलते एनीमिया का खतरा कम हो जाता है. यह दाल ब्लड शुगर को भी कम करने में मदद करती है. यह स्किन की चमक भी बनाए रखती है और उम्र बढ़ने के सिस्टम को स्लो कर देती है. इसे एंटिऑक्सीडेंट भी माना जाता है.

मोटापा रोकती है, लेकिन ज्यादा खाए तो होगी एसिडिटी

इस दाल में कार्बोहाइड्रेट भी है, जिसके चलते पेट भरा-भरा महसूस होता है. चूंकि, इस दाल में वसा भी कम है, इसलिए यह दाल वजन नहीं बढ़ाती है. इसमें पाए जाने वाले मिनरल्स हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करते हैं. अगर इस दाल का नियमित सेवन किया जाए तो सामान्य बीमारियों को दूर रखा जा सकता है. इस दाल को आंखों के लिए भी लाभकारी माना जाता है. मसूर की दाल का अधिक सेवन न करें. पकाने से पहले इसे कुछ देर भिगों देंगे तो पेट में गैस की समस्या नहीं होगी. ज्यादा खा लेने का एक कष्ट यह भी हो सकता है कि यह दाल शरीर में एसिड पैदा करने लग जाती है, इसलिए भोजन में इसको सामान्य रूप से शामिल करें.

Tags: Food, Lifestyle

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