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Bhojpuri: घाघ आ भड्डरी के कहावत, निरोग रहे के देशी उपाइ, बिना खरचा के

हमरा नाम के आगे-पीछे डॉक्टर अउर ओझा लिखला से मति बूझीं कि हम वैद्य-गुनी हईं. बाकिर ई जरूर बा कि जवन आपके बतावे जात बानी, ऊ अनुभव के कमाई हवे. मानल जाला कि मौसम बदले के टाइम लोगन के सावधान रहे के चाहीं. एकर कारन बोखार-खांसी त होखबे करेला, संगही पेट के प्राबलम भी बहुते होखेला. बाकिर एकरा के कहां केहू मानतबा. शहर त शहर, गांव-देहात में भी लोग बिना सोचले समझले कुछऊ खात रहत बा. कवनो शक नइखे कि एह खइला में आनंद बा, सवाद मिलत बा. तब काहे चिंता होखे. ई बात कुआर (क्वार) यानी अश्विन महीना बीतला अउर कातिक शुरू भईला पर एसे इयादि आइल बा कि मौसम फेरू बदलत बा. बरसात से जाड़ा के बीचे शरद ऋतु खतमे बूझीं. शारदीय नवरात्रि हो गईल, लक्ष्मी पूजा मतलब दीवाली आवते बा. नवरात्रि से पुरनका लोग इयादि कइ सकेला कि कुआर में 15 दिन के पितृपक्ष अउर नौ दिन के नवरात्रि में भोजन के मामला में केतना शुद्धता रखल जाला. धरम के संगे ई दिन शरीर के खातिर भी खास होखेला. अब त चिकित्सा विज्ञान भी मानतबा कि एह मौसम में खानपान पर ध्यान दिहल जरूरी रहेला. हमनी के पुरनिया एह बात के कवनो ना कवनो तरीका से पहिलही जानत-मानत रहले. तबे देखीं कि अबो ओहि लोगन के जबान पर खाये-पीये के बारे में तरह-तरह के कहावत रहेला.

खाना में परहेज पर कहावत
मौसम के बदलाव में सबसे पहिले घाघ कवि के ई कहावत यादि कइल जाउ. घाघ कवि कहले बाड़े- “क्वारे दूध ना कातिक मही.” दूध त सभे जानेला. मही कहल जाला पातर दही, मतलब मट्ठा के. शरद ऋतु में शरीर के अंदर कफ बने लागेला. एसे कार्तिक महीना में दही अइसन पदार्थ खाए के मनाही बा.

कहल गईल बा-सावन साग न भादो दही, क्वार करैला न कार्तिक मही. एह कातिक के पहिले कुआर अउर ओकरा पहिले सावन- भादो. दूनो बरखा के महीना होखेला. सावन में साग, यानी कि पत्तई वाला सब्जी एसे मना बा कि ओहमें बरसाती कीड़ा होखेले. एहि तरे जइसे ऊपर कातिक के बात कहल गईल बा, दू महीना पहिले भादो में दही एसे मना बा कि ओहमे फंगस हो सकेला. कुआर में करइला खइला से पित्त के रोग के खतरा होखेला. कुआर के महीना मौसम बदले वाला दिन होखेला. चलीं पूरा कहावत देखल जाउ-
चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठे पन्थ असाढ़े बेल.
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला न कातिक मही.
अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फागुन चना.
ई बारह जो देय बचाय, वहि घर बैद कबौं न जाय.

समझल जासकेला कारण
चैत माह में दिन गरम अउर राति ठंडा होखेले. अइसना मौसम में वात-पित्त बढ़े के डर रहेला. एही से गुड़ खाए के मना कइलबा. एगो अउर बात ईबा कि एह महीना में व्रत-त्योहार बहुते होला अउर लोग मीठा ज्यादा खाले. अइसना में कवि घाघ गुड़ खाए के मना कइले बाड़े. रात-दिन के तापमान में उतार-चढ़ाव के कारन ही चैत में खट्टा फल खाए से मनाही बा.

बैसाख में गरमी शुरू होजाले. अइसना में तेल के प्रयोग एसे मना बा कि ओसे भोजन गरिष्ठ होजाला अउर पचे में प्राबलम होखेला. जेठ महीना सबसे गरम होला. अइसना में पाचन तंत्र कमजोर रहेला. एह महीने में लाल मिर्च अउर ज्यादा मसाला खाए से खाना पचे में दिक्कत हो सकेला. पहिले लोग पैदल चलत रहलहा. एसे यात्रा से भी बचे के सलाह बा. अबो लोग तेज गरमी में बहरा निकले से बचबे करेला. आषाढ़ में बरसात शुरू होखला से मौसम के बदलाव के महीना हवे. एहि घरी बेल मौजूद रहेला बाकिर ओके खाए से एह कारन मनाही बा कि आयुर्वेद के हिसाब से बेल विरेचक होला अउर एसे पेट के बेमारी होसकेला. सावन में खूबे बरखा होखला से पाचन तंत्र कमजोर रहबे करेला. एहपर साग यानी पत्ती वाली सब्जी एसे मना बा कि ओहमें बरसाती कीड़ा होसकेले, जवना से बेमारी अउर बढ़े के खतरा रहेला. एह महीना साग खइला से पित्त भी बढ़ेला. ढेर बरसात गाय-भैंस के चारा पर भी असर डालेला. संगही दही जमावे के दौरान फंगस के खतरा से भादो में दही खाये से मनाही बा. क्वार यानी अश्विन माह में जाड़ा के पहिले सूर्य भगवान के असर कम होखे लागेला. एसे दूध अउर करेला जइसन पदार्थ से शरीर में कब्ज और पित्त के शिकायत बढ़ि जाला. कहल बा कि ए महीना में ए दूनो चीज से बचे के चाहीं.

अइसहीं माघ के ठंडा में मूली खाए से बचे के कहल गइल बा कि मूली के तासीर ठंडा होला अउर एसे तरह-तरह के व्याधि हो सकेला. फागुन फेरु से मौसम बदले वाला दिन होला. ओहमे चना अइसना कड़ा अनाज नुकसानदेह हो सकेला.

कब का खाये के चाहीं
ऊपर के कहावत में खाना में परहजे के बात कहल गइलबा. कुछ जगह ईहो बतावल गइलबा कि कवना महीना में का खाये चाहें अउर का करे के चाहीं. घाघ से अलगा एगो कवि भड्डरी नाम के भइल बाड़े. एह बारे में उनकर कहनाम बा-
चइते चना, बइसाखे बेल, जेठे सयन असाढ़े खेल
सावन हर्रे, भादो तीत, कुवार मास गुड़ खाओ नीत
कातिक मुरई, अगहन तेल, पूस कर दूध से मेल
माघ मास घिव खिंच्चड़ खा, फागुन में उठि प्रात नहा
ये बारे के सेवन करे, रोग दोस सब तन से डरे.
एह कहावत में कुल्हि बात साफ समझे लायक बा. तनी अलगा जवन बा, ओहमें जेठ के दिनमें थोड़ी देर सूते अउर आषाढ़ में खेल-कसरत करे के चाहीं.

अउर भी बहुत कुछ बा
एह कवि लोग के कहला पर ध्यान देबे लायक बा. अरबी के सब्जी अउर पूड़ी खाए के अलगे आनंद होखेला, बाकिर बड़ा नुकसानदेह होखेला. एकरा लगातार खइला से आदमी कब्ज के गंभीर रोगी हो सकेला-
जाको मारा चाहिए बिन मारे बिन घाव
वाको यही बताइए घूइया पूरी खाव.

स्वस्थ रहे खातिर कहले गइलबा कि जल्दी सूत अउर जल्दी जाग. हमनी के बच्चा लोग के भी अंग्रेजी में अर्ली टू बेड, अर्ली टू राइज, मेक्स ए मैन हेल्दी वेल्दी एंड वाइज कहि के समझावे लींजा. ईबात त घाघ कवि कबे कहि गइल बाड़े-
पहिले जागे पहिले सोवे, जो वह सोचे वही होवे.

आजकल त बेड-टी के अइसन बेमारी बा कि पूछीं मति. बिस्तर से उठिए के चाय चाहीं. पहिलहूं शौच के पहले कुछ पिएके बाति कहल गइल बा लेकिन ऊ चाय ना पानी हवे-
प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरंते पानी
वाके घर में वैद्य ना आवे बात घाघ के जानीं.
शौक में व्यायाम शुरू कइके छोड़ि देबे वाला, ताल में नहाये वाला अउर ओस में खुला आसमान के नीचे सुतेवाला के बेमारी होखबे करी-
जबहि तबहि डंडै करै, ताल नहाय, ओस में परे
देव न मारे आपै मरे.

घाघ अउर भड्डरी बाड़े मशहूर
एह तरी के कहावत खातिर कवि घाघ अउर भड्डरी के नाम लिहल जाला. पुरनका लोग अबो दुनो जने के कहावत बतावेले. असल में लोगन के बीच खेती-किसानी के ज्योतिष अउर ज्ञान के लोकप्रिय करे वाला ई दूनो लोग बड़का विद्वान रहे. घाघ स्वास्थ्य के भी जानकारी रखसु. घाघ के असल नाम देवकली दुबे रहे अउर ऊ बिहार में छपरा के रहे वाला रहले. कहल जाला कि बहू से विवाद के बाद कवि घाघ मध्य प्रदेश के कन्नौज में बसि गइले. उनका विद्वता के कहानी सम्राट अकबर तक पहुंचल. घाघ पर खुश होके सम्राट उनकरा के चौधरी के उपाधि देले रहले. जवन जागीर मिलल रहे,ओह से ‘अकराबाद सराय घाघ’ बसावे के प्रमाण बा. एहि तरे कवि भड्डरी भी रहले. ऊहो ज्योतिष के प्रकांड पंडित रहले. उनकर स्थान बनारस के कहीं आसपास बतावल जाला. ई जरूर लागत बा कि दूनो जने एकहि समय में रहे लोगन. एसे कि कहीं कहीं ‘कहे घाघ सुन भड्डरी’ जइसन लाइन भी मिलेला. जवन होखे, आचार्य वराह मिहिर के बृहत्संहिता अउर ओकर टीका लिखेवाला भट्टोत्पल के भटोत्पली में खेती-किसानी से जुड़ल ज्योतिष में बहुत कुछ बा, लेकिन संस्कृत साहित्य के ज्ञान ना रखे वाला किसान लोगन खातिर ई दूनो कवि बहुत भारी काम कइ गइले. अइसे कवि घाघ अउर भड्डरी के जानकार भी अब कम रहि गइल बाड़े.

(डॉ. प्रभात ओझा स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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