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Bhojpuri: पटना में पृथ्वीराज कपूर जवन कहले रहन आज उहे प्रकाश झा…

प्रकाश झा के कहनाम बा, अगर फिलिम में कहानी ना रही तs ऊ कभियो ना चली. चाहे फिल्म में कतनो नामी एक्टर होखस. फिलिम में कहानी चाहीं. ओरिजनल कंटेंट चाहीं. इहे कमी के चलते आजकाल्ह फिलिम फलौप हो रहल बा. एही तरे 1951 में पृथ्वीराज कपूर पटना में कहले रहन, रंगमंच तs सजल बा लेकिन खेले खातिर निमन नाटक नइखे मिलत. हिंदी के महान लेखक लोग से आग्रह बा कि ऊ हमार मन के मरम समझस. अगर हिंदी के महान नाटककार लोग के लिखल नाटक में हमरा अभिनय के मौका मिली तs हम अपना के धन्य समझब. एकरा बाद पृथ्वीराज कपूर साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी अउर जानकी वल्लभ शास्त्री के लिखल कईअक गो नाटक खेलले. मतलब रंगमंच होके भा सिनेमा, हर काल में निमन कहानी के मांग रहल बा.

लेकिन सिनेमा में साहित्यकार के पूछ कहां बा ?
मोतीलाल ‘मधुकर’ सवाल कइले, लेकिन हिंदी सिनेमा में साहित्यकार के पूछ कहां बा? समाज-परिवार के सुख-दुख के कहानी लिखे वला प्रेमचंद के फिलिमी दुनिया में निबाह ना भइल रहे. एक्के सिनेमा ‘मिल मजदूर” के कहानी लिखले कि मन उबिया गइल. कहानी में काट-छांट अउर दखल से अनराज ऊ मायानगरी के छोड़ देले रहन. तब रामजनम जबाब देले, ई सही बात बा कि फिलमी दुनिया में प्रेमचंद सफल ना भइले लेकिन गुलशन नंदा कमाल कर देले रहन. एकरा बादो कुछ साहित्यकार फिलमी दुनिया अउर टेलीविजन में सफल भइले. डाक्टर राही मासूम रजा, पंडित नरेन्द्र शर्मा, ख्वाजा अहमद अब्बास, कमलेश्वर के कामयाबी मिलल रहे. भगवती चरण वर्मा के लिखल उपन्यास पर बनल फिलिम ‘चित्रलेखा’ सफल भइल रहे. आर के नारायण के उपन्यास पs बनल फिलिम ‘गाइड’ सिलवर जुबली मनवले रहे. सिनेमा में साहित्यकार के सफलता मिलल जुलल बा. लेकिन नाटक में उनका लोग के अहम जोगदान बा. भारतेंदु हरिश्चंद्र के अंधेर नगरी, जयशंकर प्रसाद के ध्रुवस्वामिनी, रामवृक्ष बेनीपुरी के अंबपाली, मोहन राकेश के असाढ़ के एक दिन, धर्मवीर भारती के अंधायुग नाटक बहुत लोकप्रियता भिल रहे.

1951 में पटना आइल रहन पृथ्वीराज कपूर
लेखक मथुरालाल ‘मनमौजी’ कहले, रामवृक्ष बेनीपुरी, पृथ्वीराज कपूर के बारे में बहुत संस्मरण लिखले बाड़े. एकरा बारे में हमहूं कुछ पढ़ले बानी. शब्द से चित्र बनावे वला महान साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी के पृथ्वीराज कपूर से बहुत नजदीकी रहे.1951 में पृथ्वीराज कपूर अपना नाटक मंडली के साथे पटना आइल रहन. करीब बारह दिन तक पटना में डेरा जलले रहन. छव गो नाटक खेलले रहन. उनकर नाटक देखे खातिर अदिमी के रेला उमड़ गइल रहे. सीट पहिलहीं फुल हो जात रहे. पइसा खरचा कइला के बादो टिकट के कवनो गुंजाइश ना रहे. पूरा पटना उनकर नाटक देखे खातिर पगलाइल रहे. 1946 में बेनीपुरी जी जननायक जेपी साथे बोम्बे गइल रहन. बेनीपुरी जी ओह घरी अंबपाली नाटक लिखले रहन. लेकिन छपल ना रहे. बोम्बे में बेनीपुरी जी आपन सरोकारी पृथ्वीराज कपूर से मिले गइले. एह मोलकात में बेनीपुरी जी आपन नाटक अंबपाली के चरचा कइले. नाटक के शुरुआती भाग सुन के पृथ्वीराज कपूर बहुत परभावित भइले. ऊ बेनीपुरी जी के तीन दिन अपना घरे रोक के पूरा नाटक सुनले रहन.

राज कपूर के कवि विट्ठल भाई पटेल से मोलकात
मथुरालाल मनमौजी के बात जारी रहे. पृथ्वीराज कपूर जइसन ही राज कपूर भी रहन. कहानीकार अउर कवि से उनकर भी बहुत लगाव रहे. बिहार के नामी साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास पs बनल फिल्म तीसरी कसम में ऊ हीरे के रौल कइले रहन. ई फिल्म बनवले रहन कवि शैलेन्द्र. शैलेन्द्र के साहित्य जगत में बहुत नांव रहे. मध्यप्रदेश के कांग्रेस नेता विट्ठल भाई पटेल कवि भी रहन. उनकर शैलेन्द्र से जानपहचान रहे. जब फिल्म तीसरी कसम के शूटिंग बिहार के पूरनिया में होत रहे तब बिठ्ल बाई पटेल के शैलेन्द्र से मोलकात भइल. ऊ कहानी के सिचुएशन के मोताबिक मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में भी शूटिंग के सलाह देले. ‘लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हिनाया’ गाना के शूटिंग बुंदेलखंड में ही भइल रहे. एही समय राजकपूर के परिचय बिट्ठल भाई पटेल से भइल रहे.

बॉबी के गीतकार, फिर MLA मिनिस्टर
मथुरालाल मनमौजी आगा कहले, फिलिम ‘मेरा नाम जोकर’ जब फलौप हो गइल तब राज कपूर कर्जा में डूब गइले. उनकर पुरान संघतिया साथ छोड़ देले. तब राज कपूर नाया टीम बना के फिल्म बॉबी बनवले. संगीतकार के रूप में लक्षमीकांत प्यारे लाल रखले. गीत लिखे के जब सवाल आइल तब उनका कवि बिट्ठल भाई पटेल के इयाद आइल. बिट्ठल भाई बॉबी के दू गीत लिखले- ‘झूठ बोले कौव्वा काटे’ अउर ‘ना मांगू सोना चांदी ना मांगू हीरामोती’ . दूनो गीत सुपर हिट रहल. एकरा अलावा एगो अउर कवि बॉबी में गीत लिखले रहन- राजकवि इंद्रजीत सिंह तुलसी. उनकर लिखल गीत- ‘बेशक मंदिर मस्जिद’ के गवले रहन नरेन्द्र चंचल. बाद में बिट्ठल भाई पटेल कांग्रेस के टिकट पS मध्य प्रदेश के सुरखी बिधानसभा क्षेत्र से 1980 अउर 1985 में बिधायक बनल रहन. अर्जुन सिंह अउर मोती लाल बोरा के सरकार में ऊ मंतरी भी रहन.

प्रकाश झा हरमेसा समकालीन विसय पs फिलिम बनवले
भोजपुरी के कवि नीलकांत ‘नीलेश’ कहले, लेकिन प्रकाश झा जवना संदर्भ में कहानी अउर कंटेंट के बात कहले बाड़े ऊ साहित्य से नइखे जुड़ल. उनका कहे के मतलब बा कि कहानी समकालीन अउर ओरिजनल कहानी होखे के चाहीं जवन कि दरसक के पसंद आवे. साउथ भा हौलीबुड के रिमेक से काम ना चली. हिंदी के आपन नाया कहानी होखे के चाहीं. प्रकाश झा शुरू से ओरिजनल कहानी पर जोर देत रहल बाड़े. ऊ आपन पहिला फिल्म ‘दामुल’ बनवले रहन जे शैवाल के कहानी ‘कालसूत्र’ पर आधारित रहे. 1980 के आसपास बिहार में बंधुआ मजदूर के जवन पीड़ा रहे उहे दामुल में देखावल गइल रहे. एक फिलिम के राष्ट्रीय पुरस्कार मिलल रहे. शैवाल गांव-गांव घूम के बहुत रिसर्च कइला के बाद कहानी लिखत रहन. उनके कहानी पर प्रकाश झा मृत्युदंड फिलिम भी बनवले रहन. गंगाजल, अपहरण, आरक्षण जइसन फिल्म ओरिजन कंटेंट पर बनल रहे. आज भी ऊ समकालीन बिसय पर ही फिल्म चाहे सीरियल बना रहल बाड़े. नीलकांत के बाद अउर लेखक भी आपन-आपन बिचार परगट कइले.

(अशोक कुमार शर्मा स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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