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Diwali 2022: दिवाली की महफिल में सुनाएं ये चुनिंदा शेर और कविताएं, सब कहेंगे वाह-वाह

Diwali 2022 Couplets and Poems: देशभर में दिवाली का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. किसी को पटाखें जलाना पसंद होता है तो कई लोग इससे परहेज भी करते हैं. बहुत सारे लोग इसे अपनों के साथ मनाना चाहते हैं. ऐसे में वे दिवाली पार्टी में जाते हैं या घर पर ही इसे प्लान कर लेते हैं. अगर इस साल आप अपने घर पर दिवाली की पार्टी करने का प्लान बना रहे हैं तो इसमें कुछ फन एक्टिविटीज़ को शामिल कर सकते हैं, जिसमें से एक ओपन माइक इवेंट हो सकता है. इसमें आप भी परफॉर्म करें.

अगर आप खुद शेर-ओ-शायरी नहीं करते तो आप कुछ मशहूर दिवाली स्पेशल शायरियां और कविताएं पढ़ कर सुना सकते हैं.

दिवाली स्पेशल शेर

सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या
-हफ़ीज़ बनारसी

आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं
आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ
-अज़्म शाकरी

राहों में जान घर में चराग़ों से शान है
दीपावली से आज ज़मीन आसमान है
-ओबैद आज़म आज़मी (साभार-रेख़्ता)

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राहों में जान घर में चराग़ों से शान है
दीपावली से आज ज़मीन आसमान है
-ओबैद आज़म आज़मी

खिड़कियों से झाँकती है रौशनी
बत्तियाँ जलती हैं घर घर रात में
-मोहम्मद अल्वी (साभार-रेख़्ता)

दिवाली स्पेशल कविताएं

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें

दीप से दीप मिलें

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें

लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में
लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में
लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में
लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में
लक्ष्मी सर्जन हुआ
कमल के फूलों में
लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में

गिरि, वन, नद-सागर, भू-नर्तन तेरा नित्य विहार
सतत मानवी की अँगुलियों तेरा हो शृंगार
मानव की गति, मानव की धृति, मानव की कृति ढाल
सदा स्वेद-कण के मोती से चमके मेरा भाल
शकट चले जलयान चले
गतिमान गगन के गान
तू मिहनत से झर-झर पड़ती, गढ़ती नित्य विहान

उषा महावर तुझे लगाती, संध्या शोभा वारे
रानी रजनी पल-पल दीपक से आरती उतारे,
सिर बोकर, सिर ऊँचा कर-कर, सिर हथेलियों लेकर
गान और बलिदान किए मानव-अर्चना सँजोकर
भवन-भवन तेरा मंदिर है
स्वर है श्रम की वाणी
राज रही है कालरात्रि को उज्ज्वल कर कल्याणी

वह नवांत आ गए खेत से सूख गया है पानी
खेतों की बरसन कि गगन की बरसन किए पुरानी
सजा रहे हैं फुलझड़ियों से जादू करके खेल
आज हुआ श्रम-सीकर के घर हमसे उनसे मेल
तू ही जगत की जय है,
तू है बुद्धिमयी वरदात्री
तू धात्री, तू भू-नव गात्री, सूझ-बूझ निर्मात्री

युग के दीप नए मानव, मानवी ढलें
सुलग-सुलग री जोत! दीप से दीप जलें
–माखनलाल चतुर्वेदी (साभार-कविता कोश)

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साथी, घर-घर आज दिवाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!

फैल गयी दीपों की माला
मंदिर-मंदिर में उजियाला,
किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

हास उमंग हृदय में भर-भर
घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

आँख हमारी नभ-मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,
दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
–हरिवंशराय बच्चन (साभार-कविता कोश)

Tags: Diwali, Diwali Celebration, Diwali festival, Lifestyle, Literature

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